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Saturday, 31 December 2016

BREAKING: भारत ने छीनी चीन से अपनी जमीन, देखती रह गई दुनिया, देखता रहा चीन...

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एशिया में खुद को एक-दूसरे से ज्‍यादा ताकतवर साबित करने की चीन और भारत की होड़ नई बात नहीं है। हालांकि, पिछले कुछ सालों में भारत ने इस मामले में बाजी मार ली है।

चीन को टक्‍कर देते हुए उसने एशिया में अपनी खोई हुई जमीन वापस पा ली है। इसके पीछे जहां भारत की रणनीतिक सूझबूझ एक अहम कारक है वहीं चीन की एक 'कमजोरी' ने भी इसमें अहम भूमिका निभाई है। और वह 'कमजोरी' है किसी देश के शीर्ष नेतृत्‍व से डील करने का चीन का आकर्षण। नेपाल और श्रीलंका के मामलों में जहां यह साफ दिखाई देता है वहीं मालदीव में भी जमीन तैयार हो रही है।

सत्‍ता से बेदखल किए गए मालदीव के राष्‍ट्रपति मोहम्‍मद नशीद के वापस लौटने के फैसले पर उनके खिलाफ अरेस्‍ट वॉरंट जारी करने का मालदीव सरकार का फैसला सत्‍तारूढ़ अब्‍दुल्‍ला यामीन की सरकार की चिंताओं की तरफ इशारा करता है। 2012 में नशीद को जब अचानक सत्‍ता से हटाया गया था तब भारत बैकफुट पर चला गया था और इस छोटे से द्वीपीय देश में चीन के आगे बढ़ने का रास्‍ता साफ हो गया था।

नशीद के पतन और उनकी गिरफ्तारी में उनके द्वारा जल्‍दबाजी में उठाए गए कुछ कदमों ने भी काफी योगदान दिया। हालांकि, इलाज के लिए उनके ब्रिटेन चले जाने और वहां शरण लेने के बाद अब श्रीलंका लौटने के उनके फैसले ने राजनीति में नए बदलाव की जमीन तैयार की है। नशीद के कदमों को भारत ने समर्थन दिया है और अब दबाव यामीन के ऊपर है।


भारत बेसब्री से चाहता है कि मालदीव में चुनाव हों और नशीद को अपने विरोधियों को चुनौती देने का एक मौका मिले। ऐसा इसलिए क्‍योंकि इन विरोधियों ने अपने प्रभाव का इस्‍तेमाल कर एक हद तक भारत को मालदीव से दूर रखा है और चीन के साथ दोस्‍ती बढ़ाई है। यह इसी दोस्‍ती का नतीजा था कि चीनी राष्‍ट्रपति शी चिनफिंग ने 2014 में मालदीव का दौरा किया था।

हालांकि, मोदी सरकार ने भी बढ़त बनाने की कोशिश वाले एक कदम के तहत इस साल की शुरुआत में ही मालदीव के साथ एक रक्षा सहयोग संधि की थी, लेकिन नशीद के लौटने से परिस्थितियां और ज्‍यादा भारत के अनुकूल हो सकती हैं। इससे एक तरफ जहां मालदीव में चीन की योजनाओं को चुनौती मिलेगी वहीं भारत को फायदा होगा।

भारत द्वारा पर्दे के पीछे से चली गईं कुछ चालों के अलावा देश के शीर्ष नेतृत्‍व से डील करने की चीन की रणनीति ने भी एशिया में बढ़त बनाने में भारत को काफी फायदा पहुंचाया है। नेपाल और श्रीलंका के मामलों में इसे साफ तौर पर देखा जा सकता है। इन दोनों देशों में शीर्ष नेतृत्‍व के बदलने के बाद चीन के हितों को थोड़ा झटका जरूर लगा है।

नेपाल में केपी शर्मा ओली पर हद से ज्‍यादा निर्भर होने का खामियाजा चीन को भुगतना पड़ रहा है। ओली जिस भारत विरोधी कार्ड के जरिए चीन का हित साध रहे थे, वह अब बीते दिनों की बात हो चुकी है। उन्‍होंने मधेसी आंदोलन और इससे हुए नुकसान का जिम्‍मा भारत के सिर डाल राजनीतिक हित साधने की कोशिश की, पर आखिरकार वह नाकाम हुई। पुष्‍प कमल दहल उर्फ प्रचंड का दुबारा सत्‍ता में आना भारत के लिए बढ़‍िया है और उन्‍होंने भारत से संबंधों को और पुख्‍ता करने की बात कही है।


 श्री लंका में महिंदा राजपक्षे के कार्यकाल के दौरान श्री लंका, चीन के पाले में चला गया था। हालांकि, सत्‍ता बदलने और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के श्री लंका दौरे से दोनों देशों के संबंधों में और मजबूती आई है।

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